holi thi

“They speak of a homeland…My homeland is the rhythm of a guitar, a few portraits, a bamboo sword, the willow grove’s visible prayer as evening falls…”

when anirudh wrote this down i just stared at it in profound nothingness…. it explained why i haven’t been able to change my wallpaper for years on end now… (it’s been 6 years now!) It’s a photograph taken by Jodi Cobb from NatGeo (see for urself…)

Homeland

Meanwhile… life has had a myriad set of twists and turns. Horoscopes have ranged from death cards to saying that the world and its possibilities give me vertigo! (and most of it strangely enough has conspired..) Needless to say the writer in me has also transformed with each mood and melancholy….

I share this morphed melancholy with you…

(I) ज़िन्दगी.. इसके इन रंगों को हम अक्सर black and white में ढालने की गलती कर देते हैं… रोज़ मर्राह की इस गुमनाम सी चाल में हमें इन्द्रधनुष नज़र नहीं आता… और फिर इसी भाग दौड़ से हट के हम ‘मन की शांति’ की तलाश में अपने बनाए हुए घर और सुकून से दूर भागते हैं..

बस.. शायद थोडा सा वक़्त मांगती है ज़िन्दगी हमारी हर खिलखिलाती ख्वाइश को पूरा करने के लिए..

आज भी ज़िन्दगी शायरी की वोही किताब है जिसके हर अलफ़ाज़ में एक रंग छिपा है..!

(II) और फिर आज वो अपना सारा काम अनजाने परिंदों के नाम करके दुनिया देखने निकली है…

कहीं उसने दुनिया के अन्धकार के एक छोटे से हिस्से को अपनी दुनिया में शामिल होने का हक़ दे दिया है.. और शायद अपने सुकून के लिए ये ठीक भी है… दर्द बिना ख़ुशी के एहसास को समझना मुश्किल होता है… अन्धकार बिना इन छोटी छोटी उजाले की किरणों का लुत्फ़ उठाना शायद नामुमकिन है…

तो बस… अपनी छोटी सी मुट्ठी में अपनी दुनिया के हर रंग को समेटे आज वो निकली है नए रंगों की तलाश में… उन्हें अपना बनाने.. उनकी अनकही हँसी में कुछ देर खोने…

वैसे उसकी ज़िन्दगी का नया रंग है pink! हाँ.. वो खुद भी कुछ shock में ही है.. पर अब रंगों का क्या है.. एक खुबसूरत सी रंगोली को पूरा करने और होली में उद्धम मचाने के लिए गुलाल भी तो ज़रूरी है… ! है न हँसी का ये रंग?
(III) इन रंगों में खो कर… या फिर इनसे परे.. कहीं कोई किसी को फटकार रहा है… कहीं कोई हँसी के ठहाके मार रहा है… कहीं सपनो की ढेर साड़ी planning चल रही है… और कहीं कोई किसी को ढूँढ़ते हुए अकेले सर झुकाए इन गलियों से गुज़र रहा है…
यहाँ लोगों की इस भीड़ में मैं भी शायद अपनी बनायीं तन्हाई के किसी कोने में खुश रहती हूँ… कभी सर उठाके देखूं तो रात उतनी अँधेरी नहीं लगती… एक न एक तारा टिमटिमाते हुए हमेशा मुस्कान ले ही आता है…
वैसे तो कई आदतें हैं अच्छी और बुरी… पर मन में इच्छा है की ये आदत बनी रहे… और मैं बेवजह सी इस भीड़ में अपनी तन्हाई का हाथ थाम के कुछ इस तरह ही चलती रहूँ…
और हाँ… अभी भी कोई आसमान देख रहा होगा… तो कोई गुफ्तुगू में मगन होगा… कोई अपनी स्पेशल someone का handbag लिए इंतज़ार कर रहा होगा… तो कोई अनजानी इस भीड़ में शायद किसी अनजाने का साथ खोज रहा होगा…!
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आप अपनी खुशियों में महफूज़ रहे… while i resign to the peace and quiet of my homeland..!